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बिहार के आर्केस्ट्रा में गाने वाली लड़की जो अपने आत्मसम्मान से कभी समझौता नहीं कर पाती

अविनाश दास द्वारा निर्देशित हिंदी फिल्म "अनारकली ऑफ़ आरा" 24 मार्च को प्रदर्शित होने जा रही है। पहले इस फिल्म का नाम अनारकली आरावाली था। बतादें कि लगभग 20 वर्षों से प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एक पत्रकार और लेखक की भूमिका  निभाते आ रहे 'अविनाश दास' द्वारा निर्देशित यह फिल्म कुछ खास पहलुओं को लेकर सुर्खिया बटोर रही है।
फिल्म का शीर्षक ही इन सुर्ख़ियों की शुरुआत करता है "अनारकली ऑफ़ आरा"। अविनाश दास की इस फिल्म में पंकज त्रिपाठी, संजय मिश्रा और स्वरा भास्कर जैसे मंझे हुए कलाकारों की जोड़ी देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि यह फिल्म न सिर्फ कहानी, बल्कि अभिनय की दृष्टिकोण से भी बॉलीवुड में उम्दा छाप छोड़ने वाली है।
शायद यह पहली फिल्म है जिसकी कहानी में सिर्फ बिहारी टोन नहीं, बल्कि  बिहारी पात्र भी हैं और कहानी भी बिहार पर ही आधारित है। बहुत कम ही देखा गया है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री बिहार की कहानी लेकर आये। मगर अब ये प्रयोगधर्मिता कहें या बिहारी कलाकारों की हिम्मत का नतीजा जो इस फिल्म पर भरोसा करने वाले प्रोड्यूसर भी मिले हैं और मीडिया में चर्चाएँ भी।
फिल्म की कहानी बिहार के एक शहर ‘आरा’ में आर्केस्ट्रा में गाने वाली लड़की की है। कैसा होता है जीवन इस तरह गाने वाली लड़कियों का, क्या होती है सोच उन्हें लेकर समाज की या उनकी खुद की? क्या दिखाना चाहता है एक निर्देशक इस कहानी में? कहानी की प्रेरणा कहाँ से मिली? ऐसे ही तमाम सवालों के जवाब अविनाश दास जी से पूछे जा रहे हैं। 

फिल्म के ‘आरा’ पर आधारित होने से कयास लगाये जा रहे थे कि क्या फिल्म भोजपुरी में है? जवाब में अविनाश जी कहते हैं, कि अनारकली आॅफ आरा खांटी हिंदी फिल्म है। बिहारी ज़बान का फ्लेवर आपको इसमें ओरिजनल ढंग से मिलेगा। कहानी को एक लाइन में परिभाषित करते हुए निर्देशक कहते हैं, एक गाने वाली लड़की की कहानी है, जो अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं कर पाती।
फिल्म क्यों देखनी चाहिए के जवाब में निर्देशक का कहना है, कि यह स्त्री अस्मिता की कड़ी में आने वाली एक अहम फिल्म है। समाज के तथाकथित फूहड़ पायदान पर दिखने वाली एक स्त्री के स्वाभिमान की कहानी है। इसलिए इसे ज़रूर देखना चाहिए। 
अविनाश जी खुद दरभंगा के रहने वाले हैं, फिल्म के वहाँ से नहीं होने का कारण बताते हुए वे कहते हैं, क्योंकि दरभंगा मधुबनी में बाईजी के नाच की लोकप्रिय परंपरा नहीं रही है। पुराने मध्य बिहार में पीढ़ियों ने इसका आस्वाद लिया है और ले रही है। आरा से मेरी अच्छी वाक़फियत रही है। मैं यूपी के एक सिंगर से इंस्पायर्ड हुआ था। लेकिन यूपी की ज़बान पर मेरी पकड़ नहीं थी। इसलिए मैंने बिहार के इस शहर का चयन किया। 
फिल्म की प्रेरणा के बारे में श्री दास बताते हैं कि  2006 या 07 में मैंने यूट्यूब पर ताराबानो फ़ैज़ाबादी का एक गाना सुना था। 'हरे हरे नेबुआ कसम से गोल गोल'। इस म्यूज़िक वीडियो में कुछ सेकेंड के लिए ताराबानो का फुटेज़ है। उसमें उनके चेहरे के सपाट भाव ने मुझे एक स्ट्रीट सिंगर की कहानी कहने के लिए प्रेरित किया।
वहीं उन्होंने कहा कि स्वरा को इसलिए लिया क्योंकि मुझे लगता है कि स्वरा के अलावा इस किरदार को कोई और नहीं निभा सकता था। 
फिल्म में नब्बे फ़ीसदी से ज़्यादा बिहार के ही कलाकार हैं।
फिल्म का नाम पहले ‘अनारकली आरावाली’ था। गौरतलब हो कि पटना फिल्म महोत्सव में भी इसी नाम की चर्चा थी। फिर इसके ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ हो जाने का कारण अविनाश जी ने बताया कि   हमें यही नाम प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन से मिला। हां, हम ये लड़ाई वहां जीत गये कि नाम में आरा ज़रूर शामिल रहे। वरना हमें देसी पाॅप और द क्वीन जैसे नाम मिल रहे थे।
बचपन से सिनेमा का शौक पालने वाले अविनाश दास ने मौका मिलते ही अपने शौक को परवाज़ दिया। इस शौक के बारे में वो बताते हैं, कि सिनेमा करने की बात मन में बचपन से थी। लेकिन जीवन की परिस्थितियों के चलते मैं कुछ और कर रहा था। लेकिन जब चार-पांच साल पहले यह अंतिम तौर पर तय किया, तो ज़ाहिर है परिवार से दूर मुंबई आना पड़ा।

फिल्म जगत के साथ आमजन की भी इस फिल्म को लेकर उत्सुकता और उम्मीदें हैं। बताया जा रहा है कि आरा जिला का मशहूर डायलॉग “आरा जिला घर बा त कौन बात के डर बा” भी इस फिल्म में इस्तेमाल किया गया है। फिल्म प्रेमी अच्छे डॉयलोग्स, कहानी और कलाकारी देखने के लिए 24 मार्च का बेसब्री से इंतेजार कर रहे हैं।













 
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