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दाऊद खां को राम से लगाव था, कहते थे ‘रामायण मुझे नहीं छोड़ेगा’

Sep 10, 2016 

#गुंजन कुमार की प्रस्तुति:------------------

हनुमान से भी ज़्यादा दाऊद खां को राम से लगाव था, कहते थे ‘रामायण मुझे नहीं छोड़ेगा’

तुम राम कहो, वो रहीम कहें, दोनों की गरज़ अल्लाह से है
तुम दीन कहो, वो धर्म कहें, मंशा तो उसी की राह से है. (अज्ञात)

उपर्युक्त वाक्य 94 साल के दाऊद खां रामायणी पर ख़ूब फ़बता है. मानवता और धार्मिक समरसता की मिसाल खां साहब को रामचरितमानस के प्रवचनकर्ता के तौर पर भी जाना जाता है.  हालांकि, अब वो हमारे बीच नहीं रहे. 6 सितंबर को उनकी मृत्यु हो गई. वे राम से इस क़दर जुड़ गए थे कि उन्हें अलग कर पाना बहुत ही मुश्किल था. कट्टरपंथी लोगों के लाख डराने और धमकाने के बावजूद, जवाब देते हुए वे कहते थे 'मैं तो छोड़ दूं, पर रामायण मुझे नहीं छोड़ेगा.'

Source: Dainik Bhaskar

छत्तीसगढ़ के धमतरी में एक किराए के मकान में रहने वाले दाऊद खां रामायणी, मुस्लिम होने के बावजूद रामचरितमानस का प्रवचन करते थे. ये इनका शौक़ भी था और राम के प्रति मोहब्बत भी. उनका जन्म 25 जुलाई 1923 को धमतरी में ही हुआ था. आइए, राम के इस अनोखे भक्त के बारे में जानते हैं.


Source: Dainik Bhaskar

आठवीं तक की पढ़ाई करने के बाद दाऊद टीचर बन गए. टीचिंग करते हुए ही उन्होंने बीए तक की पढ़ाई पूरी की. जिले के कई स्कूलों में वे टीचर रहे.

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राम से पहली मुलाक़ात

1947 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में उन्होंने रामायण पर प्रवचन दिया और उसके बाद तो वह उनका जुनून बन गया.

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राष्ट्रपति भी सम्मानित कर चुके हैं

1970 में तत्कालीन राष्ट्रपति वीवी गिरि को हाथों दाऊद खान शिक्षा के क्षेत्र में बेहतरीन काम के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार मिला.

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राष्ट्रपति भवन में भी प्रवचन कर चुके हैं.

बाद में राष्ट्रपति भवन में दाऊद खान का रामायण पर प्रवचन भी हुआ. तब डॉ शंकरदयाल सक्सेना राष्ट्रपति थे.

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सामाजिक सराबोर में डूब चुके थे

परिवार होने के बावजूद दाऊद किराए के कमरे में अकेले रहते थे. बाकी का समय सामाजिक कामों में लगाते थे. जगह-जगह रामायण पर प्रवचन के लिए उन्हें बुलाया जाता था. उसकी कमाई को गरीब बच्चों को पढ़ाने में लगाते थे. 20 बच्चों को उन्होंने हायर एजुकेशन दिलाई, जिनमें से पांच डॉक्टर और तीन इंजीनियर बन चुके हैं.

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रामायण के प्रसार में दिए उनके योगदान के कारण इलाहाबाद यूनिवर्सिटी ने उन्हें 'रामायण रत्न' की उपाधि दी. जब तक वो ज़िंदा रहे, राम के ही हो कर रहे. धार्मिक समरसता के लिए इससे बड़ा कोई उदाहरण नहीं हो सकता. भगवान राम उनकी आत्मा को शांति दें.

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